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नाट्यशास्त्र के निर्माण का प्रयोजन ‘भरत वाक्य’ नाटक में सार्थक: डॉ. बालकृष्ण शर्मा

दो नाटकों 'भरत वाक्य' और 'पुकार' की पुस्तक का विमोचन

उज्जैन। यथार्थ सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था द्वारा ओडिशा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नाटककार निवेदिता जेना के दो नाटकों ‘भरत वाक्य’ और ‘पुकार’ की पुस्तक का विमोचन किया गया। इस अवसर पर सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं संस्कृत के विद्वान डॉ. बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि नाट्यशास्त्र के निर्माण का प्रयोजन ‘भरत वाक्य’ नाटक में पूरी तरह सार्थक होता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. बालकृष्ण शर्मा, रंगकर्मी सतीश दवे और साहित्यकार राम दवे ने दीप प्रज्वलित कर किया। इसके पश्चात भुवनेश्वर (ओडिशा) की रचनाकार निवेदिता जेना की पुस्तक का विमोचन हुआ।
समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. बालकृष्ण शर्मा ने बताया कि ‘भरत वाक्य’ संस्कृत नाटकों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। आमतौर पर नाटक के अंत में मंगलकामना के रूप में भरत वाक्य का प्रयोग होता है, जिसके बाद नाटक समाप्त हो जाता है। लेकिन नाटककार ने इस नाटक को समाप्ति से आरंभ किया है। यह नाटक आधुनिक काल की ‘फ्लैशबैक’ तकनीक की तरह लिखा गया है। उन्होंने बताया कि नाट्यशास्त्र में ‘जर्जर’ (इंद्र के वज्र का प्रतीक) का विशेष महत्व है, जिसे कलाकार मंच पर सबसे पहले स्थापित करते हैं, लेकिन इस नाटक में जर्जर अंत में आया है। नाट्यशास्त्र की निर्मिति का मूल उद्देश्य—दुखार्त, श्रमार्त, शोकार्त और तपस्वियों के दुख को दूर करना—इस नाटक में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
प्राचीनता और आधुनिकता का अद्भुत समावेश
साहित्यकार राम दवे ने कहा कि नाटककार ने ‘भरत वाक्य’ नाटक के समापन वाक्य को ही प्रथम वाक्य बना दिया है, जो एक अनूठा प्रयोग है। वहीं, रंगकर्मी सतीश दवे ने कहा कि इस नाटक में प्राचीनता और आधुनिकता का अद्भुत समावेश किया गया है, जो इसे आज के समय में अत्यधिक प्रासंगिक बनाता है।
‘पुकार’ में दर्शाई गई दुष्कर्म पीड़िताओं की व्यथा
कार्यक्रम के अगले चरण में डॉ. पांखुरी वक्त जोशी ने नाटक ‘पुकार’ में दर्शाई गई दुष्कर्म पीड़िताओं की गंभीर व्यथा पर प्रकाश डाला। इसके बाद रंगकर्मी प्रकाश देशमुख ने ‘पुकार’ नाटक के कुछ मार्मिक अंशों का प्रभावी पाठ किया।
इस अवसर पर प्रेमचंद सृजनपीठ के निदेशक मुकेश जोशी, रंगकर्मी गिरजेश व्यास, चित्रकार मुकेश बिजोले और साहित्यकार राजेश सक्सेना ने भी नाटकों के विषय में अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. पांखुरी वक्त जोशी ने किया और आभार प्रकाश देशमुख ने माना। आयोजन की विस्तृत जानकारी संस्था के उपाध्यक्ष विशाल कलम्बकर ने दी।

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