मनोरंजन

निर्मल वर्मा को जीवंत किया कहानियों के नाट्यमंचन ने

अभिनव रंगमंडल का 40वां समारोह: शरद शर्मा के निर्देशन में मंच पर साकार हुई निर्मल वर्मा की मौन कथा-चेतना

निर्मल वर्मा के पात्रों का जीवंत मंचन: धूप का एक टुकड़ा और डेढ़ इंच ऊपर के साथ अभिनव नाट्य समारोह का भव्य समापन
पढ़ने और सुनने की विधा बनी ‘देखने’ का अनुभव, दर्शकों ने सराहा निर्मल वर्मा की कहानियों का नाट्य रूपांतरण
उज्जैन। भारत सरकार संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित अभिनव रंगमंडल के 40वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह का समापन रविवार 8 फरवरी को कालिदास अकादमी के अभिरंग नाट्य गृह में एक यादगार शाम के साथ हुआ। समारोह के छठे और अंतिम दिन वरिष्ठ रंगकर्मी एवं निर्देशक शरद शर्मा ने हिंदी के प्रसिद्ध लेखक निर्मल वर्मा की दो कालजयी कहानियों ‘धूप का एक टुकड़ा’ और ‘डेढ़ इंच ऊपर’ को मंच पर उतारकर पढ़ने और सुनने की विधा को ‘देखने’ की विधा में बदलने का सफल प्रयोग किया।
मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद का बेहतरीन उदाहरण
निर्मल वर्मा की कहानियाँ अपनी सूक्ष्मता, आंतरिक मौन और संवेदनाओं के लिए जानी जाती हैं। निर्देशक शरद शर्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती कहानी के अंतर्मन को बाहरी नाटकीयता में बदले बिना दृश्यात्मक बनाना था। दोनों प्रस्तुतियाँ स्मृति, अनुभूति और आत्मसंघर्ष के प्रवाह में आगे बढ़ीं, जिसने दर्शकों को गहरे मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद का अनुभव कराया।

‘धूप का एक टुकड़ा’ अकेलेपन का मार्मिक चित्रण
पहली प्रस्तुति ‘धूप का एक टुकड़ा’ में एक अकेली महिला के जीवन, उसके नॉस्टेल्जिया और यादों के संघर्ष को दिखाया गया। इस नाटक में घटनाओं से ज्यादा अनुभूतियां प्रधान थीं। केंद्रीय भूमिका में कामना भट्ट ने अपने सुदीर्घ रंग अनुभव का परिचय देते हुए अभिनय को बेहद धारदार बनाया। भूषण जैन ने अपनी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका में दर्शकों को प्रभावित किया।
‘डेढ़ इंच ऊपर’ युद्ध की विभीषिका और भय
दूसरी प्रस्तुति ‘डेढ़ इंच ऊपर’ दर्शकों को केवल देखने नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए आमंत्रित करती नजर आई। यह कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक बूढ़े जर्मन व्यक्ति के अकेलेपन और भय की दास्तां है, जिसकी पत्नी को गेस्टापो (नाजी पुलिस) उठा ले जाती है। मुख्य पात्र को अंकित दास ने पूरी शिद्दत के साथ जिया। उन्होंने क्रोध, क्षोभ और विवशता के भावों को मंच पर जीवंत कर दिया। अतिथि भूमिकाओं में रूबल शर्मा और जजा सिद्दीकी ने अपनी छाप छोड़ी।
पेंटिंग्स और प्रकाश ने बांधी समां
इन नाटकों की सफलता में तकनीकी पक्ष का भी अहम योगदान रहा। मंच सज्जा में विख्यात चित्रकार मुकेश बिजौले की पेंटिंग्स का उपयोग कर निर्देशक ने कथा को एक नई अंतर्दृष्टि दी। भूषण जैन के संगीत संकलन और राघवेंद्र कौशिक के सधे हुए प्रकाश संचालन (लाइटिंग) ने दृश्यों को और अधिक प्रभावी बना दिया।
मेजबान संस्था अभिनव रंगमंडल की ये नई प्रस्तुतियां दर्शकों के दिलों में उतर गईं, जिसने उज्जैन में थिएटर के उज्ज्वल भविष्य के प्रति सभी को आश्वस्त किया।

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