भारतीय दिनचर्या और ज्ञान परंपरा में रची-बसी है पर्यावरण सुरक्षा
माधव विज्ञान महाविद्यालय में ’प्राचीन काल में पर्यावरणीय संरक्षण’ पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

कैंसर जैसी बीमारियों का हल भी भारतीय प्राकृतिक तकनीकों में मौजूद – डॉ. रावल
उज्जैन। शासकीय माधव विज्ञान महाविद्यालय, उज्जैन में ’प्राचीन काल में पर्यावरणीय संरक्षण की पद्धतियां’ विषय पर एक भव्य अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। देश-विदेश से आए विषय विशेषज्ञों ने एक सुर में यह माना कि पर्यावरण संरक्षण हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और दैनिक जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा रहा है, जिसे आज आधुनिक विज्ञान भी अपना रहा है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एसजीएसआईटीएस इंदौर के निदेशक डॉ. नीतेश पुरोहित ने अपने संबोधन में कहा कि हमारी ज्ञान परंपरा और जीवन शैली पूरी तरह से पर्यावरण सम्मत और विज्ञान आधारित है। उन्होंने कहा, “हमारे दैनिक व्यवहार और दिनचर्या में पर्यावरणीय सजगता इस तरह से आत्मसात है कि उसे अलग से देखने या सिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।“
आधुनिक शोध भी देख रहे हैं भारत की ओर
अमेरिका स्थित दक्षिणी कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी (लॉस एंजिल्स) से आए विशेष वक्ता एवं रिसर्च एसोसिएट डॉ. चेतन रावल ने वैश्विक दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि बदलते परिदृश्य में जीव विज्ञान के आधुनिक शोध भी भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के समाधान भी भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राकृतिक संरक्षण तकनीकों में तलाशे जा रहे हैं।
वहीं, सेंट्रल यूनिवर्सिटी गांधीनगर (गुजरात) के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. धीरज राठौर ने विशेष वक्ता के रूप में अपने विचार रखे। उन्होंने ’सर्कुलर इकोनॉमी’ (चक्रीय अर्थव्यवस्था) की दृष्टि से भारतीय संसाधनों के संरक्षण के प्राचीन तरीकों को विश्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
दिनचर्या में शामिल थे संरक्षण के तरीके
कार्यक्रम के मुख्य संरक्षक एवं उज्जैन संभाग के अतिरिक्त संचालक डॉ. एच.एल. अनिजवाल ने इस सेमिनार को विद्यार्थियों के लिए बेहद सार्थक बताते हुए कहा कि यह आयोजन युवाओं को भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिक ज्ञान परंपरा से जोड़ने में सहायक सिद्ध होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. हरीश व्यास ने बताया कि हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण बचाने के जो तरीके विकसित किए थे, वे सीधे तौर पर हमारी दिनचर्या में शामिल थे।
इससे पूर्व, कार्यक्रम की संयोजक डॉ. शुचिता चांदोरकर ने विषय प्रवर्तन किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण की शुद्धता और संरक्षण एक सतत आवश्यकता है, और हम प्राचीन काल से ही इसके लिए विकसित और प्रामाणिक तरीकों का प्रयोग करते आ रहे हैं।
15 शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोध पत्र
इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में 15 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र (पेपर प्रेजेंटेशन) प्रस्तुत कर विषय के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। अतिथियों का स्वागत प्राणीशास्त्र (जूलॉजी) विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल पांडे, डॉ. शुचिता चांदोरकर और डॉ. अजय सक्सेना द्वारा किया गया।
संपूर्ण कार्यक्रम का सफल संयोजन डॉ. शुचिता चांदोरकर ने किया, जबकि अंत में सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार प्रो. अनिल पांडे ने माना। इस अवसर पर महाविद्यालय के सभी प्राध्यापकगण और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।



