धर्म-कर्म

महाशिवरात्रि विशेष: फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी पर शिवलिंग में साक्षात विराजते हैं शिव, रुद्राभिषेक से मिलता है अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष

महाशिवरात्रि से बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं

सदियों पुरानी मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर सर्वव्यापी भगवान शिव साक्षात शिवलिंग में विराजते हैं। यही कारण है कि इस दिन शिवलिंग पर रुद्राभिषेक और पूजन का विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रों में महाशिवरात्रि से बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं बताया गया है।

पौराणिक महत्व: देवताओं को शिव ने बताया था व्रत

पुराणों के अनुसार, एक समय सभी देवी-देवताओं ने सर्वकल्याण के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की थी। उन्होंने मनुष्यों को पापों से मुक्ति और कष्ट निवृत्ति के लिए कोई ऐसा विधान और दिन बताने का आग्रह किया जो वर्ष भर मनुष्य के लिए कल्याणकारी हो और अनिष्ट शक्तियों से रक्षा कर सके। इस पर भगवान शिव ने फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन व्रत और पूजन के बारे में देवताओं को बताया।

शिवलिंग में होता है शिव का वास

मान्यता है कि इस दिन भूतल के समस्त चल-अचल शिवलिंगों में भगवान शिव वास करते हैं। जो मनुष्य विधि-विधानपूर्वक पूजन करता है, उसकी रक्षा स्वयं कालों के काल महाकाल करते हैं। ऐसा सुनकर देवऋषि नारद ने भूतल पर पधारकर ऋषि-महर्षियों को महाशिवरात्रि की महिमा सुनाई और ऋषियों की प्रेरणा से सर्वजन कल्याण के लिए प्रत्येक गृहस्थ को महाशिवरात्रि व्रत और पूजन का उपदेश दिया।

रुद्राभिषेक का महत्व और लाभ

महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक का अत्यंत महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ‘रुद्र’ का अर्थ है दुखों का नाश करने वाला और ‘द्रव्य’ का अर्थ है पिघलना। यानी जो दुखों को दूर करे वही रुद्र है। रुद्राभिषेक के माध्यम से भक्त अपने दुख, कष्ट और नकारात्मक भावों को भगवान शिव को अर्पित करता है।

  • मानसिक शांति: रुद्राभिषेक से मन की अशांति दूर होती है और व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
  • पाप कर्मों का क्षय: रुद्राभिषेक और रुद्रार्चन से पाप कर्मों का क्षय होता है और साधक के भीतर शिव तत्व का जागरण होता है।
  • धन और सुख: आर्थिक स्थिति में सुधार और करियर में स्थिरता के लिए भी यह पूजा की जाती है। इससे पारिवारिक जीवन में मधुरता बढ़ती है।

महाशिवरात्रि चार प्रहर पूजा विधि

​महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों में बांटकर विशेष पूजा का विधान है:

  1. प्रथम प्रहर: शिवलिंग का जल और दूध से अभिषेक करें। बेलपत्र, भांग, धतूरा, फल और सफेद फूल अर्पित करें। ‘नमः शिवाय’ मंत्र का 108 बार जाप करें और कपूर से आरती करें।
  2. द्वितीय प्रहर: शिवलिंग का दही और घी से अभिषेक करें। फिर से धतूरा, भांग, फल, फूल, चंदन, बेलपत्र आदि चढ़ाएं। शिव के किसी भी मंत्र का जाप करें और नई चीजों का भोग लगाएं।
  3. तृतीय प्रहर: शिवलिंग का शहद और शक्कर मिले जल से अभिषेक करें। चंदन, अक्षत, धतूरा, बेलपत्र अर्पित करें। ध्यान और मौन साधना करें।
  4. चतुर्थ प्रहर: शिवलिंग का गंगाजल या शुद्ध जल से अंतिम अभिषेक करें। फल-नैवेद्य अर्पित करें और क्षमा प्रार्थना के साथ शिव की कपूर से आरती करें।

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