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रत्नों का संबंध केवल आभूषण से नहीं, ब्रह्मांडीय ऊर्जा से: डॉ. विजय टेलर

ग्वालियर के जीवाजी विवि में राष्ट्रीय सेमिनार: उज्जैन के ज्योतिषाचार्य का व्याख्यान, कुलपति ने किया सम्मान

उज्जैन। ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में उज्जैन के ख्यात ज्योतिषाचार्य एवं भूगर्भ शास्त्री डॉ. विजय टेलर ने भारतीय ज्ञान परंपरा में रत्नों के वैज्ञानिक महत्व को प्रतिपादित किया। 25 एवं 26 फरवरी को आयोजित इस सेमिनार में विशेष वक्ता के रूप में डॉ. टेलर ने कहा कि रत्न केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा और मानव जीवन के संतुलन का विज्ञान है।
‘भूगर्भीय रत्न विज्ञान का ज्योतिषीय महत्व’ विषय पर प्रथम सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. टेलर ने बताया कि पृथ्वी के गर्भ में कार्बन, कैल्शियम, आयरन और कॉपर जैसे तत्वों की रासायनिक क्रियाओं से रत्नों का निर्माण होता है। जहां आधुनिक विज्ञान इसे भौतिक प्रक्रिया मानता है, वहीं वेदों में इसे कालचक्र और सृष्टि क्रम से जोड़ा गया है। उन्होंने रत्नों के त्रिगुणात्मक वर्गीकरण को स्पष्ट करते हुए बताया कि सूर्य, चंद्र व गुरु सतोगुण; बुध व शुक्र रजोगुण तथा मंगल, शनि, राहु व केतु तमोगुण का प्रतिनिधित्व करते हैं।
अनुकूल रत्न ही बनाते हैं मानसिक संतुलन
डॉ. टेलर ने स्पष्ट किया कि अनुकूल रत्न सौर किरणों को ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक संतुलन साधते हैं, जबकि प्रतिकूल रत्न हानिकारक हो सकते हैं। इसलिए उचित परामर्श आवश्यक है। उन्होंने समुद्र मंथन और दधीचि प्रसंगों के जरिए रत्नों के पौराणिक संदर्भ भी रखे।
कुलगुरु ने किया सम्मान
कार्यक्रम की अध्यक्षता जीवाजी विवि के कुलगुरु प्रो. राजकुमार आचार्य ने की। सेमिनार में भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के उपमहानिदेशक डॉ. सतीश त्रिपाठी, राजा रमन सिंह विवि की कुलगुरु प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे, प्रो. एस.एन. महापात्र सहित देश के कई विद्वान उपस्थित थे। समापन पर कुलगुरु एवं संयोजक ने डॉ. विजय टेलर का विशेष सम्मान किया। यह जानकारी अरविंद जैन ने दी।

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