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राष्ट्रीय आदर्श वेद विद्यालय में शिक्षकों की भर्ती में महाघोटाला, दस्तावेजों में फर्जीवाड़े का बड़ा खुलासा

महर्षि सांदीपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन में नियमों की अनदेखी, एक ही समय में कई राज्यों में नौकरी और पढ़ाई के मिले प्रमाण

उज्जैन। शिक्षा मंत्रालय के अधीन महर्षि सांदीपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन में राष्ट्रीय आदर्श वेद विद्यालय के वेद शिक्षकों की भर्ती में बड़े घोटाले का मामला सामने आया है। दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2018 से चयन प्रक्रिया में भारी हेराफेरी कर वैदिक मौखिक परंपरा के योग्य विद्वानों को दरकिनार करते हुए बिना अनुभव वाले और दागी उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया है। इस फर्जीवाड़े के संबंध में घनपाठी वेद शिक्षक राधेश्याम पाठक द्वारा केंद्र सरकार को सेक्शन 80 के तहत लीगल नोटिस भेजा गया है। यह नोटिस 2 जुलाई 2025 को भेजा गया था।

राधेश्याम पाठक ने आरोप लगाया कि दस्तावेजों की जांच में सबसे चौंकाने वाले तथ्य एक ही समय में कई स्थानों पर उपस्थिति और फर्जी अनुभव के मिले हैं। नवंबर 2021 में शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिन शाखा के शिक्षक नियुक्त हुए राकेश देवेंद्र शर्मा के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार उन्होंने 2011 में 17 वर्ष की नाबालिग आयु में गुना मध्य प्रदेश के विद्यालय में नियुक्ति प्राप्त की थी। वे 2021 तक प्रतिष्ठान से अनुदान प्राप्त कर रहे थे। इसी अवधि में वे बदाऊं उत्तर प्रदेश से नियमित बीए और नई दिल्ली में लाल बहादुर शास्त्री केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर से शिक्षा भी ले रहे थे। यानी एक व्यक्ति एक ही समय में तीन अलग-अलग राज्यों में हर रोज काम कर रहा था। 2015 से 2016 के बीच उन्होंने जयपुर से नियमित बीएड भी किया।

इसी तरह ऋग्वेद शिक्षक सत्यम शुक्ला को 2018 में 24 वर्ष की आयु में बिना किसी अनुभव के नियुक्त किया गया, जबकि पद के लिए न्यूनतम 25 वर्ष की आयु और 10 वर्ष का अनुभव आवश्यक था। सत्यम के दस्तावेजों में एक ही समय में 700 किलोमीटर दूर गाजियाबाद और अयोध्या के दो आवासीय विद्यालयों से एक साथ पढ़ाई करना दर्ज है। वर्तमान में वे प्रतिष्ठान से पूरा वेतन लेते हुए उत्तर प्रदेश के हरदोई स्थित प्रभातेश्वर महादेव मंदिर में पुजारी का कार्य कर रहे हैं और विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से डॉ. गोविंद गन्धे के मार्गदर्शन में बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त किए नियमित पीएचडी भी कर रहे हैं।

भर्ती में कम उम्र और अनुभव छिपाने के अन्य मामले भी सामने आए हैं। सामवेद शिक्षक सौरभ नौटियाल को 2018 में मात्र 21 वर्ष की आयु में नियुक्त किया गया और दस्तावेजों में साढ़े चार वर्ष का अध्यापन अनुभव दर्शा दिया गया। उस समय वे दिल्ली से नियमित एमए और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से नियमित बीए कर रहे थे। सौरभ भी बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र के विक्रम विश्वविद्यालय से प्रो. वंदना त्रिपाठी के मार्गदर्शन में नियमित पीएचडी कर रहे हैं। वहीं वर्ष 2019 में शुक्ल यजुर्वेद शिक्षक के रूप में नियुक्त सौरभ बंडोपंत शास्त्री के पास भी 10 वर्ष का अध्यापन अनुभव नहीं था। पहले दो चयनित उम्मीदवारों के पद छोड़ने के बाद बिना नया साक्षात्कार लिए ही सचिव विरूपाक्ष जड्डीपाल ने नियमों का उल्लंघन कर उनकी नियुक्ति कर दी।

नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद और सत्यापन प्रक्रियाओं की भी जमकर अनदेखी हुई। 2022 में काण्व शाखा शिक्षक पद के लिए सार्वजनिक विज्ञापन जारी होने पर पंकज सराफ की नियुक्ति की गई। पंकज सराफ शिक्षक सौरभ बंडोपंत शास्त्री के भाई हैं। सौरभ स्वयं मंत्र स्मरण की सत्यापन परीक्षा के पैनल में शामिल थे। पंकज का नाम पात्र उम्मीदवारों की सूची में नहीं था और न ही उन्होंने सत्यापन प्रक्रिया में भाग लिया था, फिर भी सभी चयनित उम्मीदवारों को दरकिनार कर उन्हें नियुक्ति दे दी गई। आदर्श वेद विद्यालय छात्रावास के विवाद के बाद अगस्त 2025 में उन्होंने कार्य छोड़ दिया। इसी तरह 2022 में राष्ट्रीय आदर्श वेद विद्यालय पुरी में उमाकांत सामंत को बिना शॉर्टलिस्ट हुए नियुक्त किया गया। उमाकांत गाजियाबाद में सत्यम शुक्ला के शिक्षक रहे हैं और आश्चर्यजनक रूप से इस भर्ती के सत्यापन पैनल में स्वयं सत्यम शुक्ला शामिल थे।

इस पूरे महाघोटाले में प्रतिष्ठान के तत्कालीन सचिव विरूपाक्ष जड्डीपाल और अन्य अधिकारियों की कार्यप्रणाली बेहद संदिग्ध रही है। राकेश शर्मा के पास परंपरागत वेद की कोई विशिष्ट योग्यता न होने के बावजूद सचिव ने उन्हें नियुक्त किया। राकेश शर्मा और सौरभ शास्त्री की नियुक्ति के समय सचिव ने डीओपीटी के दिशा-निर्देशों के अनुसार योग्यता और अनुभव में छूट देने का कोई कारण लिखित में दर्ज नहीं किया। सचिव द्वारा समय-समय पर अनुबंध बढ़ाए गए तथा सौरभ शास्त्री का अनुबंध बिना साक्षात्कार के ही विस्तारित किया गया। दिसंबर 2019 में तो सौरभ शास्त्री को विद्यालय में शिक्षक होते हुए भी एक अन्य परीक्षा में उम्मीदवार के रूप में उपस्थित होने की अनुमति दे दी गई। अधिकारियों द्वारा किसी भी उम्मीदवार के दस्तावेजों की कोई जांच नहीं की गई। सचिव ने नियुक्तियों में सभी नियमों, सत्यापन और परीक्षा प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए अयोग्य उम्मीदवारों को लाभ पहुंचाया और इसका कोई रिकॉर्ड भी नहीं रखा। इसके अतिरिक्त जीपीआरए नियमों की अनदेखी करते हुए सत्यम और सौरभ को उज्जैन परिसर में 10,620 रुपये प्रतिमाह के बजाय मात्र 500 रुपये के मामूली शुल्क पर टाइप थ्री आवास भी आवंटित किए गए।

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