शिव पुराण में समाई हैं व्रत की तीन अद्भुत कथाएं, जानें विवाह, नीलकंठ और लुब्धक शिकारी का प्रसंग
महाशिवरात्रि, आत्मचिंतन और चेतना जागरण का महापर्व

सनातन धर्म में महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक व्रत या अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और चेतना जागरण का महापर्व है। शिव पुराण में इस पावन रात्रि का विस्तृत वर्णन मिलता है। मान्यता है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की यह रात्रि भगवान शिव की अनंत शक्ति के प्रकट होने का दिवस है। इस अवसर पर शिव पुराण में वर्णित तीन प्रमुख कथाएं और पूजन विधि का विशेष महत्व है।
1. शिव-पार्वती विवाह: अखंड सौभाग्य का वरदान
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन ही भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ था। माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इसी रात्रि विवाह स्वीकार किया था। यही कारण है कि इस दिन विवाह योग्य कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए और विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं।
2. नीलकंठ कथा: त्याग और लोककल्याण का संदेश
दूसरी प्रमुख कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब मंथन के दौरान ‘हलाहल’ विष निकला, तो सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। महाशिवरात्रि की रात्रि शिवजी के इसी त्याग और करुणा का स्मरण कराती है। यह कथा संदेश देती है कि त्याग, धैर्य और लोककल्याण की भावना ही वास्तविक शिवत्व है।
3. लुब्धक शिकारी की कथा: अनजाने में हुई पूजा का फल
शिव पुराण में लुब्धक नामक शिकारी की कथा अत्यंत प्रसिद्ध है। एक बार जंगल में शिकार की तलाश में वह एक बेल के वृक्ष पर चढ़कर रात भर जागता रहा। अनजाने में उसके हाथ से नीचे स्थित शिवलिंग पर बेलपत्र गिरते रहे। उस दिन महाशिवरात्रि थी और अनजाने में ही उसने व्रत, जागरण और बेलपत्र अर्पण का पुण्य अर्जित कर लिया। उसकी इस सहज भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मोक्ष प्रदान किया। यह कथा बताती है कि सच्ची भावना और अनजाने में की गई शिवभक्ति भी जीवन का उद्धार कर सकती है।
महाशिवरात्रि की संक्षिप्त पूजा विधि
ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर व्रत का संकल्प लें। शिवलिंग का जल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करें। बेलपत्र (तीन पत्तियों वाला), धतूरा और भस्म अर्पित करें। ‘नमः शिवाय’ मंत्र का जाप निरंतर करते रहें। निशिता काल (मध्यरात्रि) में विशेष पूजा का विधान है।
आध्यात्मिक महत्व
योगशास्त्र के अनुसार, इस रात्रि में ग्रहों की स्थिति साधना के लिए विशेष अनुकूल होती है। ध्यान, जप और संयम के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर स्थित शिव तत्व को जागृत कर सकता है। शास्त्रों में कहा गया है—’शिवरात्रि व्रतम् नाम सर्वपापप्रणाशनम’, अर्थात यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला है।



