महाभारत के अस्त्र-शस्त्र – उन्नत तकनीक और आध्यात्म से परिपूर्ण – डॉ. हरीशकुमार सिंह
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की परिकल्पना है विक्रमोत्सव और उनके सांस्कृतिक सलाहकार डॉ. श्रीराम तिवारी के संयोजन में महाभारत प्रदर्शनी अनूठी और अनुपम ज्ञान का सागर है

महाभारत और रामायण के युद्ध में प्रमुख अंतर युग, उद्देश्य और युद्ध की प्रकृति का रहा है। रामायण त्रेता युग में आज से लगभग नौ लाख वर्ष पूर्व घटित हुई, जबकि महाभारत द्वापरयुग में लगभग आज से पाँच हज़ार वर्ष पूर्व हुआ। रामायण का युद्ध भगवान राम और प्रकांड पंडित रावण के बीच सीमित था, वहीं महाभारत में देश के सभी राज्य सम्मिलित थे और यह एक तरह का विश्वयुद्ध ही था। रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम मर्यादा, त्याग और रिश्तों को महत्व देते हैं, जबकि महाभारत में श्रीकृष्ण कूटनीति, अधिकार और ज्ञान को प्रमुखता देते हैं। कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडव आमने-सामने थे और दोनों के पक्ष में अपने-अपने विश्वसनीय राज्यों के राजा और उनकी सेनाएँ थीं। अठारह दिन चले महाभारत के युद्ध में दोनों ओर कई महारथी थे, जिनसे हम सभी परिचित हैं।

मगर इन महारथियों के शस्त्र और अस्त्र उनके नामों की तरह ही अनुपम, अनूठे, अलौकिक और विज्ञान सम्मत थे। कई योद्धाओं ने ये शस्त्र और अस्त्र अपने गुरुओं को प्रसन्न कर या तपस्या कर महर्षि परशुराम, देवताओं के राजा इंद्र और सूर्यदेव आदि से प्राप्त किए थे। ऐसे ही शस्त्र और अस्त्रों से परिचित कराती है उज्जयिनी में चल रहे विक्रमोत्सव के अंतर्गत, विक्रमादित्य शोध पीठ में लगी विशाल और भव्य प्रदर्शनी – ‘महाभारत’।

महाभारत प्रदर्शनी में, युद्ध में दोनों ओर के सेनापतियों द्वारा उपयोग की गई ग्यारह विभिन्न जटिल व्यूह रचनाओं को प्रतीकात्मक रूप से बहुत सुंदरता से प्रदर्शित किया गया है। कौरवों की ओर से गुरु द्रोणाचार्य ने सबसे कठिन व्यूह रचना ‘चक्रव्यूह’ निर्मित की थी, जिसमें अंदर जाने का रास्ता तो था मगर बाहर निकलने का नहीं। यह व्यूह अर्जुन की अनुपस्थिति में उनके पुत्र अभिमन्यु को फँसाने के लिए था, और युद्ध के दिन अभिमन्यु इसमें फँसकर वीरगति को प्राप्त हुए थे। चक्रव्यूह से हम सभी भलीभाँति परिचित हैं, मगर युद्ध के अठारह दिनों में भीष्म द्वारा गरुड़ व्यूह, मंडल व्यूह और मकर व्यूह; अर्जुन द्वारा वज्र एवं अर्धचंद्र व्यूह; पांडवों का क्रोंच व्यूह; गुरु द्रोण द्वारा चक्रशकट व्यूह, कच्छप व्यूह, शृंगाटक व्यूह, ऊर्मि व्यूह, सर्वतोमुखी दंड व्यूह का प्रदर्शन हूबहू किया गया है। ये व्यूह शत्रु की रणनीति को असफल करने के लिए निर्मित किए जाते थे, और यह बताते हैं कि महाभारत काल में सेनापतियों का विवेक और चिंतन अत्यंत उन्नत और वैज्ञानिक था। उदाहरण के लिए, गरुड़ व्यूह भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के अनुरूप था, जिसमें सेना का अग्रभाग तेज, पार्श्वभाग सुदृढ़ और पृष्ठभाग विस्तृत होता था। गरुड़ व्यूह वेग, प्रतीक और आक्रामक सैन्य कला का प्रतीक है, और इन व्यूहों का आधार ज्यामिति भी है। प्रदर्शनी ‘महाभारत’ में इन व्यूहों की रचना देखना रोमांचित करता है।

इस प्रदर्शनी में अर्जुन का प्रख्यात धनुष गांडीव (जिसे अर्जुन को अग्निदेव द्वारा प्रदान किया गया था), नकुल-सहदेव का आग्नेय धनुष, कर्ण का विजय धनुष, दुर्योधन का शरासन धनुष, युधिष्ठिर का रौद्र धनुष और वैजयंती धनुष, भीष्म का अजगव धनुष, अश्वत्थामा का कोदण्ड धनुष, घटोत्कच का पौलस्त्य धनुष, शिव जी का पिनाक धनुष, सुतसोम का आग्नेय धनुष, और अर्जुन का अक्षय तुणीर (कभी न समाप्त होने वाले बाणों का दिव्य तरकश) आदि प्रतीकात्मक रूप से प्रदर्शित किए गए हैं। भगवान श्रीकृष्ण का धर्म और न्याय का प्रतीक सुदर्शन चक्र भी दिव्यता के साथ यहाँ मौजूद है। भीम और दुर्योधन की गदाएँ, फरसे, तलवार, भाले और वज्र भी प्रदर्शनी में हैं, और ऐसे करीब सौ से अधिक अस्त्र-शस्त्र यहाँ हैं। महाभारत में ब्रह्मास्त्र का भी प्रयोग हुआ था। ब्रह्मास्त्र के अलावा ब्रह्मांडास्त्र, ब्रह्मशिरास्त्र, अंजलिकास्त्र, नारायणास्त्र आदि भी दर्शाए गए हैं। चतुरंगिणी सेना के बारे में भी चित्रित और प्रदर्शित किया गया है।
असल में, जितने भी युद्ध हुए हैं उनमें सामने वाले को किसी भी तरह मारना-काटना ही युद्ध का प्रमुख उद्देश्य रहा है, मगर महाभारत का महायुद्ध सिर्फ दो सेनाओं का भीषण युद्ध नहीं था, बल्कि उस समय की उन्नत प्रौद्योगिकी, ऋषियों के ज्ञान और योद्धाओं को शस्त्र का वरदान देना, अस्त्र और शस्त्र का मंत्र की शक्तियों से चलना, महारथियों की विज्ञानपरक समझ से उपजे अस्त्र और शस्त्र का उपयोग था। रणनीतिक कौशल के लिए शास्त्र सम्मत व्यूह रचना के कारण महाभारत सबको आकर्षित करता है। पांडवों की ओर से भगवान श्रीकृष्ण ने बिना शस्त्र उठाए, अपने ज्ञान और कूटनीति से पांडवों को विजय दिलाई। यह प्रदर्शनी ‘महाभारत’ अस्त्र, शस्त्र, शौर्य और विज्ञान का दिव्य संगम है। अस्त्र और शस्त्र के साथ उनकी महत्ता को प्रदर्शित करते आलेख दर्शकों को सहूलियत प्रदान करते हैं। प्रदर्शनी में पोस्टरों के ज़रिए महाभारत के अठारह दिन के युद्ध का वर्णन पढ़ना रोमांचित करता है। प्रदर्शनी के शोधकर्ता और क्यूरेटर राज बेंद्रे बताते हैं कि महाभारत शौर्य, विज्ञान और आध्यात्म का संगम था, और महाभारत सिर्फ युद्ध नहीं, सभ्यता का आईना भी है। राज बेंद्रे के अनुसार, इस प्रदर्शनी के लिए काफी अनुसंधान किया गया है और प्रदर्शनी का उद्देश्य महाभारत को पौराणिक ग्रंथ के साथ भारत की प्राचीन सैन्य, वैज्ञानिक और रणनीतिक चेतना का दस्तावेज़ भी सिद्ध करना है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की परिकल्पना है विक्रमोत्सव और उनके सांस्कृतिक सलाहकार डॉ. श्रीराम तिवारी के संयोजन में महाभारत प्रदर्शनी अनूठी और अनुपम ज्ञान का सागर है।



