बूँद में समंदर होती है अस्तित्व, आत्मसम्मान, अधिकार, न्याय और अपनी ज़मीन की जिजीविषा -विनीत तिवारी
अभिनव रंगमंडल की मासिक संवाद श्रृंखला 'ज़ैतून में समंदर' आयोजित, साहित्यकार राधावल्लभ त्रिपाठी ने की अध्यक्षता, श्रोताओं ने महसूस किया फ़लस्तीन का दर्द

फ़लस्तीन में अपना वजूद बचाए रखना ही सबसे बड़ा प्रतिरोध: विनीत तिवारी
उज्जैन। अभिनव रंगमंडल की मासिक संवाद श्रृंखला के तहत रविवार 1 मार्च को “ज़ैतून में समंदर” विषय पर एक विशेष आयोजन किया गया। इसमें प्रसिद्ध कवि, लेखक, एक्टिविस्ट और ‘प्रगतिशील वसुधा’ के संपादक विनीत तिवारी ने फ़लस्तीन का अपना आँखों देखा सफ़रनामा साझा किया। इस गरिमामय आयोजन की अध्यक्षता संस्कृत-हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पूर्व कुलपति डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने की।
ज़ैतून और चाबी हैं फ़लस्तीनी संघर्ष के प्रतीक
हाल ही में फ़लस्तीन यात्रा से लौटे विनीत तिवारी ने बताया कि वहां होना और अपना अस्तित्व बचाए रखना ही सबसे बड़ा प्रतिरोध है। उन्होंने दास्तानगोई शैली में फ़लस्तीनी जनता के दमन, दुख और बेदखली के साथ-साथ उनके परस्पर सहयोग, बंधुत्व और इंसानी जुझारूपन का मार्मिक वर्णन किया। तिवारी ने कहा कि ‘ज़ैतून’ (ऑलिव) फ़लस्तीन की पहचान है, जो सालों तक एक बूंद पानी से भी ज़िंदा रह सकता है। वहीं, ‘चाबी’ बस्तियों से भगाए गए लोगों के अपने घर लौटने के स्वप्न का प्रमुख प्रतीक है। उन्होंने यहूदी और यहूदीवादी होने के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए इसे हिंदू और हिंदुत्ववादी होने के फ़र्क के समान बताया।
मृत सागर के किनारे बसने वालों की जीवनी शक्ति अपराजेय
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि विनीत तिवारी को सुनना निःशब्द कर देने वाला अनुभव है। उन्होंने इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हालिया हमले और वहां के प्रमुखों के मारे जाने के संदर्भ में इस आयोजन को अत्यंत साहसिक और मानवीय बताया। त्रिपाठी ने कहा कि आज समझ आता है कि मृत सागर के किनारे जीवित रहने वालों की जीवनी शक्ति कितनी प्रबल और अपराजेय है।
मानवता और न्याय के लिए संघर्ष है ज़रूरी
कार्यक्रम की शुरुआत में संचालक और कवि-कहानीकार शशिभूषण ने जगदीश चंद्र द्वारा अनूदित (वसुधा में प्रकाशित) दो फ़लस्तीनी कवियों की कविताएं सुनाईं। संवाद के दौरान वरिष्ठ रंगकर्मी हफ़ीज़ ख़ान, साहित्यकार राजेश सक्सेना और हरिमोहन बुधौलिया ने विनीत तिवारी से सवाल किए। जवाब में तिवारी ने कहा कि एक एक्टिविस्ट का उद्देश्य तुरंत बदलाव लाना नहीं, बल्कि मानवता, न्याय और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष जारी रखना होता है ताकि आने वाली पीढ़ियां अन्याय और लूट का शिकार न हों। उन्होंने कहा कि फ़लस्तीन के संघर्ष ने उन्हें डर पर विजय और स्थायी आत्मबल दिया है।
संवाद श्रृंखला को मिलेगा राष्ट्रीय स्वरूप
अंत में अभिनव रंगमंडल के प्रमुख शरद शर्मा ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि अशोक वाजपेयी के बाद इस दूसरे सफल आयोजन ने विश्वास दिलाया है कि यह संवाद यात्रा निरंतर जारी रहेगी। उन्होंने इस संवाद को भविष्य में राष्ट्रीय नाट्योत्सव की तरह व्यापक रूप देने की बात कही। इस अवसर पर देवास और इंदौर के साहित्यकार-पत्रकार, महाराष्ट्र के शोधार्थी और उज्जैन के प्रमुख साहित्यकार, कलाकार व संस्कृतिप्रेमी उपस्थित रहे।



