‘जनसांख्यिकीय लाभांश को विकास में बदलने के लिए संरचनात्मक सुधार जरूरी: प्रो. सामरा’
सम्राट विक्रमादित्य विवि में 'वैश्वीकरण और उदारीकरण का प्रभाव' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी; देशभर के अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक सुधारों और चुनौतियों पर किया मंथन
उज्जैन. सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय की अर्थशास्त्र अध्ययनशाला और भारतीय आर्थिक परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को ‘भारत में वैश्वीकरण एवं उदारीकरण का प्रभाव’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शानदार आगाज़ हुआ। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलगुरु डॉ. अर्पण भारद्वाज ने की। संगोष्ठी के पहले दिन देशभर से आए प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों और शिक्षाविदों ने 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में आए बदलावों, एलपीजी (LPG) मॉडल के फायदों और इससे उपजी चुनौतियों पर गहन मंथन किया।
वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ाव और जनांककीय लाभांश पर जोर
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के प्रो. एस. एस. सामरा ने अपने बीज वक्तव्य में वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने यूरोप और अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि आर्थिक विकास एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक-दूसरे से गहराई से जोड़ दिया है। भारत के पास जनांककीय लाभांश (Demographic Dividend) की एक बड़ी ताकत है, जिसे सही नीतियों और संरचनात्मक सुधारों के जरिए विकास के बड़े अवसर में बदला जा सकता है।
1991 के सुधारों ने अर्थव्यवस्था को बनाया प्रतिस्पर्धी
इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना और विश्वविद्यालय के कुलगीत के साथ हुआ। विभागाध्यक्ष प्रो. एस. के. मिश्रा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की प्रासंगिकता पर बात की। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण और उदारीकरण ने भारत के व्यापार और रोजगार के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है।
वहीं, भारतीय आर्थिक परिषद् के समन्वयक डॉ. अनिल कुमार ठाकुर ने परिषद् के इतिहास और भारत के आर्थिक विकास क्रम पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 1991 में अपनाए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी मॉडल) के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था कहीं अधिक खुली और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन गई है।
तकनीक और व्यापार बढ़ा, लेकिन असमानता भी एक चुनौती
अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा से आए प्रो. एन. पी. पाठक ने आर्थिक सुधारों के ऐतिहासिक विकास और वैश्विक बाजारों के प्रभाव पर बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैश्वीकरण के कारण देश में व्यापार, पूंजी प्रवाह और तकनीकी विकास में तो तेजी आई है, लेकिन इसके साथ ही रोजगार के बदलते स्वरूप, सामाजिक असमानता और आर्थिक स्थिरता जैसी नई चुनौतियां भी सामने खड़ी हुई हैं।
इन विद्वानों ने भी रखे विचार, गरिमामयी रही उपस्थिति
संगोष्ठी में गुजरात विश्वविद्यालय (अहमदाबाद) के प्रो. संजय कुमार परदेसी, कोटा विश्वविद्यालय के डॉ. एस. के. कुलश्रेष्ठ और इग्नू (पुणे) के क्षेत्रीय निदेशक सदानंद सोयाबीन सहित अनेक विद्वानों ने विषय पर अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम में प्रो. राजकुमार नीमा, प्रो. पंकज माहेश्वरी, प्रो. निखिल जोशी, डॉ. धीरेंद्र केरवाल, डॉ. सलिल सिंह, डॉ. विश्वजीत सिंह परमार, डॉ. नलिन सिंह पंवार और डॉ. आर. मूसलगांवकर विशेष रूप से उपस्थित रहे। अंत में विषय पर सारगर्भित चर्चा हुई जिसमें विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने सक्रिय रूप से अपनी जिज्ञासाएं रखीं। प्रथम दिवस की यह अकादमिक चर्चा अत्यंत ज्ञानवर्धक और विचारोत्तेजक रही।



