धर्म-कर्म

भद्रा मुक्त रहेगा इस वर्ष का रक्षाबंधन, चंद्र ग्रहण का सूतक नहीं

28 अगस्त को मनेगा पर्व, बहनें अभिजीत और गोधूलि मुहूर्त में बांध सकेंगी राखी

उज्जैन। इस वर्ष रक्षाबंधन का पावन पर्व 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन चंद्र ग्रहण को लेकर चर्चा है, लेकिन यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए देश में इसका सूतक और धार्मिक प्रभाव मान्य नहीं होगा। बहनें बिना किसी संशय के शुभ मुहूर्त में भाइयों को राखी बांध सकेंगी। इस साल रक्षाबंधन पर भद्रा का साया भी नहीं रहेगा। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम, स्नेह, विश्वास और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प का प्रतीक है।

राखी बांधने के शुभ मुहूर्त और पूजन सामग्री

मातंगी ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र के ज्योतिर्विद अजय कृष्ण शंकर व्यास ने बताया कि पूर्णिमा तिथि प्रातः 9:48 बजे तक रहेगी। राहुकाल सुबह 10:46 से दोपहर 12:22 बजे तक रहेगा। राखी बांधने के लिए अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:22 से 1:05 बजे तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 6:57 से 7:19 बजे तक श्रेष्ठ है। पूजन थाली में राखी, रोली, कुमकुम, साबुत चावल, दीपक, जल से भरा पात्र, मिठाई, नारियल, रुमाल और पुष्प रखना चाहिए। रक्षासूत्र बांधते समय ‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल’ मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।

पौराणिक मान्यताएं और लोक परंपराएं

ज्योतिर्विद अजय व्यास ने बताया कि यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण व द्रौपदी, भविष्य पुराण में इंद्राणी द्वारा देवराज इंद्र को रक्षासूत्र बांधने और माता लक्ष्मी द्वारा राजा बलि को राखी बांधकर भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ ले जाने की कथाओं से जुड़ा है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसकी अलग-अलग परंपराएं हैं। महाराष्ट्र में इसे नारळी पूर्णिमा कहा जाता है। कई क्षेत्रों में रामराखी, चूड़ाराखी और लूंबा बांधने का भी चलन है, जिसमें भाभी की चूड़ियों में रक्षासूत्र बांधकर मंगलकामना की जाती है।

श्रावणी उपाकर्म और अवनि अवित्तम

पं. अजय व्यास के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा पर यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मणों द्वारा श्रावणी उपाकर्म और हेमाद्रि स्नान किया जाता है। इसमें गोदुग्ध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र से बने पंचगव्य तथा कुशा के प्रयोग से वेदमंत्रों के साथ प्रायश्चित्त और शुद्धि कर्म होते हैं। तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र और ओडिशा सहित दक्षिण भारत में इसे अवनि अवित्तम कहा जाता है। इस अवसर पर स्नान, ऋषि-तर्पण और वैदिक कर्म करते हुए पुराना यज्ञोपवीत त्यागकर नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है, जो आत्मशुद्धि और वैदिक जीवन के संकल्प का प्रतीक है।

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